ज्ञान-विज्ञान योग
श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥
श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! अब तुम सुनो कि किस प्रकार मुझमें पूरी तरह आसक्त (प्रेमपूर्वक) मन वाला होकर और केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) लेकर योग का अभ्यास करते हुए, तुम मुझे बिना किसी संदेह (शक) के पूर्ण रूप से जान लोगे।
The Supreme Personality of Godhead said: Now hear, O son of Pritha, how by practicing yoga in full consciousness of Me, with mind attached to Me, you can know Me in full, free from doubt.
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
मैं तुम्हारे लिए विज्ञान (अनुभव) सहित इस ज्ञान (थ्योरी) को पूरी तरह से (बिना कुछ छिपाए) कहूँगा, जिसे जान लेने के बाद इस संसार में तुम्हारे लिए फिर कुछ और जानने योग्य बाकी नहीं रह जाएगा।
I shall now declare unto you in full this knowledge, both phenomenal and numinous. This being known, nothing further shall remain for you to know.
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥
हज़ारों (लाखों) मनुष्यों में से कोई विरला ही परम सिद्धि (मोक्ष) को पाने के लिए कोशिश (प्रयत्न) करता है; और इस प्रकार कोशिश करने वाले उन सिद्ध (महान) योगियों में से भी कोई विरला ही मुझे 'तत्त्व' से (यानी मैं वास्तव में कौन हूँ, इस रूप में) जान पाता है।
Out of many thousands among men, one may endeavor for perfection, and of those who have achieved perfection, hardly one knows Me in truth.
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—इस प्रकार (इन आठ तत्त्वों में) बँटी हुई यह मेरी आठ प्रकार की भौतिक प्रकृति (अपरा शक्ति) है।
Earth, water, fire, air, ether, mind, intelligence and false ego—all together these eight constitute My separated material energies.
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥
हे महाबाहो अर्जुन! यह आठ प्रकार की प्रकृति तो मेरी 'अपरा' (निम्न / जड़) शक्ति है। किंतु इसके अलावा तुम मेरी एक दूसरी 'परा' (श्रेष्ठ / चेतन) शक्ति को जानो, जो इन सारे जीवों (Living entities) के रूप में है, और जिसके द्वारा यह सारा संसार धारण किया जाता है (या चलाया जा रहा है)।
Besides these, O mighty-armed Arjuna, there is another, superior energy of Mine, which comprises the living entities who are exploiting the resources of this material, inferior nature.
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥
तुम यह निश्चित रूप से समझ लो कि (संसार के) सभी प्राणी इन दोनों प्रकृतियों (परा और अपरा) के ही संयोग (मिलन) से उत्पन्न होते हैं। इसलिए, मैं ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति (सृष्टि) का और विनाश (प्रलय) का मूल कारण हूँ।
All created beings have their source in these two natures. Of all that is material and all that is spiritual in this world, know for certain that I am both the origin and the dissolution.
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
हे धनंजय (अर्जुन)! मुझसे श्रेष्ठ (बड़ा या ऊपर) कोई दूसरा तत्त्व (या सत्ता) इस संसार में नहीं है। जिस प्रकार मोतियों की माला में सारे मोती एक ही धागे में पिरोए रहते हैं, उसी प्रकार यह संपूर्ण ब्रह्मांड मुझमें ही पिरोया हुआ (टिका हुआ) है।
O conqueror of wealth, there is no truth superior to Me. Everything rests upon Me, as pearls are strung on a thread.
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥
हे कुंतीपुत्र (अर्जुन)! मैं जल (पानी) में उसका रस (स्वाद) हूँ, चंद्रमा और सूर्य में मैं प्रकाश (रोशनी) हूँ, सभी वेदों में मैं 'ॐकार' (ॐ) हूँ, आकाश में मैं शब्द (ध्वनि) हूँ, और मनुष्यों में मैं पौरुष (सामर्थ्य या योग्यता) हूँ।
O son of Kunti, I am the taste of water, the light of the sun and the moon, the syllable om in the Vedic mantras; I am the sound in ether and ability in man.
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥
मैं पृथ्वी (मिट्टी) में उसकी पवित्र सुगंध (महक) हूँ, और मैं ही अग्नि (आग) में उसका तेज (गर्मी) हूँ। सभी प्राणियों में मैं उनका जीवन (प्राण) हूँ, और मैं ही सभी तपस्वियों में उनकी तपस्या हूँ।
I am the original fragrance of the earth, and I am the heat in fire. I am the life of all that lives, and I am the penances of all ascetics.
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥
हे पार्थ! तुम मुझे सभी प्राणियों का सनातन (कभी नष्ट न होने वाला) बीज (मूल कारण) जानो। मैं ही बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ, और मैं ही तेजस्वी (प्रभावशाली) पुरुषों का तेज हूँ।
O son of Pritha, know that I am the original seed of all existences, the intelligence of the intelligent, and the prowess of all powerful men.
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! मैं बलवानों का वह बल (शक्ति) हूँ, जो कामनाओं और आसक्ति (स्वार्थ) से पूरी तरह मुक्त है। और सभी प्राणियों में मैं वह 'काम' (इच्छा या यौन-संबंध) हूँ, जो धर्म (नैतिकता और शास्त्रों) के विरुद्ध नहीं है।
I am the strength of the strong, devoid of passion and desire. I am sex life which is not contrary to religious principles, O lord of the Bharatas (Arjuna).
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥
तुम यह जान लो कि जो कुछ भी सात्त्विक (अच्छाई), राजसिक (वासना/काम) और तामसिक (अज्ञान/आलस्य) भाव या अवस्थाएं हैं, वे सभी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं। मैं उनमें स्थित नहीं हूँ (यानी मैं उनके वश में नहीं हूँ), बल्कि वे सब मुझमें स्थित (मेरे अधीन) हैं।
Know that all states of being—be they of goodness, passion or ignorance—are manifested by My energy. I am, in one sense, everything, but I am independent. I am not under the modes of material nature, for they, on the contrary, are within Me.
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥
प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज और तम) से युक्त इन भावों (अवस्थाओं) के द्वारा यह सारा संसार मोहित (भ्रमित) हो रहा है; इसी कारण यह संसार इन तीनों गुणों से परे और अविनाशी (अव्यय) मुझ परमेश्वर को नहीं जान पाता है।
Deluded by the three modes [goodness, passion and ignorance], the whole world does not know Me, who am above the modes and inexhaustible.
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
प्रकृति के तीन गुणों से युक्त मेरी यह ईश्वरीय माया (भ्रम में डालने वाली शक्ति) पार करने में अत्यंत कठिन है। किंतु जो मनुष्य केवल मेरी ही शरण लेते हैं (मुझमें समर्पण कर देते हैं), वे इस माया को आसानी से पार कर जाते हैं।
This divine energy of Mine, consisting of the three modes of material nature, is difficult to overcome. But those who have surrendered unto Me can easily cross beyond it.
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥
जो बुरे कर्म (पाप) करने वाले हैं, जो मूर्ख हैं, जो मनुष्यों में सबसे नीच हैं, जिनका ज्ञान माया के द्वारा चुरा लिया गया है, और जो आसुरी (राक्षसी) स्वभाव को धारण किए हुए हैं—ऐसे लोग मेरी शरण में नहीं आते।
Those miscreants who are grossly foolish, who are lowest among mankind, whose knowledge is stolen by illusion, and who partake of the atheistic nature of demons do not surrender unto Me.
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! चार प्रकार के पुण्य कर्म करने वाले (अच्छे) लोग मेरा भजन (पूजा) करते हैं: 1. आर्त (जो दुखी या संकट में हैं), 2. अर्थार्थी (जिन्हें धन या सांसारिक सफलता की चाह है), 3. जिज्ञासु (जो ईश्वर के रहस्य को जानना चाहते हैं), और 4. ज्ञानी (जो सत्य को जान चुके हैं)।
O best among the Bharatas, four kinds of pious men begin to render devotional service unto Me—the distressed, the desirer of wealth, the inquisitive, and he who is searching for knowledge of the Absolute.
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥
उन (चारों प्रकार के भक्तों) में से, जो ज्ञानी है, जो हमेशा मुझमें लगा रहता है (नित्य-युक्त) और केवल मुझमें ही अनन्य भक्ति (एक-भक्ति) रखता है, वह अति श्रेष्ठ है। क्योंकि मैं उस ज्ञानी को अत्यधिक प्रिय हूँ, और वह ज्ञानी मुझे अत्यधिक प्रिय है।
Of these, the one who is in full knowledge and who is always engaged in pure devotional service is the best. For I am very dear to him, and he is dear to Me.
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥
ये सभी (चारों प्रकार के भक्त) निश्चय ही उदार (श्रेष्ठ) हैं, किंतु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा ही स्वरूप (मेरी ही आत्मा) है—ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह एकाग्र मन वाला (ज्ञानी भक्त) केवल मुझे ही अपनी सर्वोच्च गति (मंज़िल) मानकर मुझमें ही स्थित रहता है।
All these devotees are undoubtedly magnanimous souls, but he who is situated in knowledge of Me I consider to be just like My own self. Being engaged in My transcendental service, he is sure to attain Me, the highest and most perfect goal.
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
अनेक जन्मों के अंत में (कई जन्मों तक सत्य की खोज करने के बाद), जिसे सच्चा ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वह इस विचार के साथ मेरी शरण में आता है कि 'वासुदेव (भगवान कृष्ण) ही सब कुछ हैं'। ऐसा महात्मा (महान आत्मा) इस संसार में अत्यंत दुर्लभ है।
After many births and deaths, he who is actually in knowledge surrenders unto Me, knowing Me to be the cause of all causes and all that is. Such a great soul is very rare.
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥
किंतु जिनकी बुद्धि (ज्ञान) विभिन्न प्रकार की सांसारिक इच्छाओं (कामनाओं) द्वारा हर ली गई है, वे लोग अपने ही स्वभाव के वश में होकर, अन्य (छोटे) देवी-देवताओं की शरण में जाते हैं और उन देवताओं से जुड़े विशेष नियमों (कर्मकांडों) का पालन करते हैं।
Those whose intelligence has been stolen by material desires surrender unto demigods and follow the particular rules and regulations of worship according to their own natures.
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥
जो-जो (अज्ञानी) भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा के साथ पूजना चाहता है, मैं उस-उस भक्त की श्रद्धा को उसी देवता के प्रति अचल (मज़बूत) कर देता हूँ।
I am in everyone's heart as the Supersoul. As soon as one desires to worship some demigod, I make his faith steady so that he can devote himself to that particular deity.
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥
वह भक्त उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की पूजा करता है, और उस देवता से अपनी मनचाही चीज़ें (मनोकामनाएं) प्राप्त करता है; किंतु वास्तव में वे इच्छाएं केवल मेरे द्वारा ही पूरी (प्रदान) की जाती हैं।
Endowed with such a faith, he endeavors to worship a particular demigod and obtains his desires. But in actuality these benefits are bestowed by Me alone.
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥
किंतु उन कम बुद्धि वाले (अज्ञानी) लोगों को मिलने वाला वह फल नाशवान (खत्म होने वाला) होता है। देवताओं की पूजा करने वाले लोग देवताओं के लोकों में जाते हैं, लेकिन मेरे भक्त अंत में मेरे पास (मेरे परमधाम) ही आते हैं।
Men of small intelligence worship the demigods, and their fruits are limited and temporary. Those who worship the demigods go to the planets of the demigods, but My devotees ultimately reach My supreme planet.
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥
बुद्धिहीन (अज्ञानी) लोग, जो मेरे सर्वश्रेष्ठ, परम और अविनाशी स्वभाव को नहीं जानते हैं, वे ऐसा मानते हैं कि मैं (भगवान कृष्ण) पहले अव्यक्त (निराकार) था और अब मैंने यह साकार रूप (व्यक्ति/शरीर) धारण किया है।
Unintelligent men, who do not know Me perfectly, think that I, the Supreme Personality of Godhead, Krishna, was impersonal before and have now assumed this personality. Due to their small knowledge, they do not know My higher nature, which is imperishable and supreme.
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
मैं अपनी योगमाया (अंतरंगा शक्ति) द्वारा ढका होने के कारण सबके लिए प्रकट (दिखाई देने वाला) नहीं हूँ। इसलिए यह मूर्ख संसार मुझे अजन्मा और अविनाशी परमेश्वर के रूप में नहीं जान पाता है।
I am never manifest to the foolish and unintelligent. For them I am covered by My internal potency, and therefore they do not know that I am unborn and infallible.
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥
हे अर्जुन! मैं उन सब प्राणियों को जानता हूँ जो भूतकाल (Past) में बीत चुके हैं, जो वर्तमान (Present) में हैं, और जो भविष्य (Future) में होंगे। किंतु मुझे (मेरे असली स्वरूप को) कोई भी नहीं जानता।
O Arjuna, as the Supreme Personality of Godhead, I know everything that has happened in the past, all that is happening in the present, and all things that are yet to come. I also know all living entities; but Me no one knows.
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥
हे भरतवंशी! हे परंतप (अर्जुन)! इच्छा (राग) और द्वेष (घृणा) से उत्पन्न होने वाले द्वंद्वों (सुख-दुख, मान-अपमान आदि) के मोह (भ्रम) के कारण, जन्म लेते ही संसार के सभी प्राणी भारी अज्ञान (भ्रम) में पड़ जाते हैं।
O scion of Bharata, O conqueror of the foe, all living entities are born into delusion, bewildered by dualities arisen from desire and hate.
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥
किंतु जिन पुण्य कर्म करने वाले मनुष्यों के पाप पूरी तरह से नष्ट (समाप्त) हो चुके हैं, वे लोग द्वंद्वों (सुख-दुख, लाभ-हानि) के मोह से पूरी तरह मुक्त होकर, दृढ़ निश्चय (मज़बूत इरादे) के साथ मेरी भक्ति (पूजा) में लग जाते हैं।
Persons who have acted piously in previous lives and in this life and whose sinful reactions are completely eradicated are freed from the dualities of delusion, and they engage themselves in My service with determination.
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥
जो लोग बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति (मोक्ष) पाने के लिए मेरा आश्रय (सहारा) लेकर प्रयत्न (भक्ति) करते हैं, वे वास्तव में ब्रह्म को (परम सत्य को), संपूर्ण अध्यात्म (जीवात्मा के स्वरूप) को, और संपूर्ण कर्मों की सच्चाई को पूरी तरह से जान जाते हैं।
Intelligent persons who are endeavoring for liberation from old age and death take refuge in Me in devotional service. They are actually Brahman because they entirely know everything about transcendental activities.
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥
जो लोग मुझको 'अधिभूत' (संपूर्ण भौतिक जगत का स्वामी), 'अधिदैव' (सभी देवताओं का नियंता) और 'अधियज्ञ' (सभी यज्ञों/कर्मों का परम भोक्ता) के रूप में जानते हैं—ऐसे मुझमें लगे हुए चित्त (मन) वाले भक्त मृत्यु के समय भी मुझे ही जानते हैं (अर्थात मुझे भूलते नहीं हैं और मुझे ही प्राप्त होते हैं)।
Those in full consciousness of Me, who know Me, the Supreme Lord, to be the governing principle of the material manifestation, of the demigods, and of all methods of sacrifice, can understand and know Me even at the time of death.